कोई मुझे शहीद की परिभाषा तो बताये…

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बिहार.. हां यह वही बिहार है, जो संवेदना, ममता, देशभक्ति, दुख-दर्द, प्यार-मुहब्बत.. हर चीज को जातिवाद की तराजू में तौलता है। यहां की सरकार योजना बनाती है तो वोट बैंक के हिसाब से, कोई धनराशि जारी करती है तो जाति-धर्म देखकर। हद तो तब हो जाती है, जब हमारे रणबांकुरों के लिये भी सरकार यही रवैया अपनाती है. शायद ये नेता, ये मंत्री, ये मुख्यमंत्री भूल जाते हैं। जब ये वातानुकूलित कमरों में चैन की नींद सोते हैं तो यह हमारे जवान सरहद पर देश की निगरानी में जान तक गंवा देते हैं. फिर भी इन जवानों की कद्र नहीं है. उन शहीदों की कद्र नहीं है.

हाल ही में बिहार सरकार (मुख्यमंत्री नीतीश कुमार) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक सांसद (सारण के सांसद राजीव प्रताप रूढ़ी) ने वो कारनामा कर दिखाया है, जो शहीदों के अपमान का ताजा उदाहरण है. छह अक्तूबर की सुबह अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में इंडियन एयर फोर्स का हेलिकॉप्टर ड्यूटी के दौरान क्रैश हुआ. उस दौरान थल सेना की बटालियन के लिये मिट्टी तेल की आपूर्ति की जा रही थी. तभी हादसा हुआ. हेलिकॉप्टर में पांच वायुसेना और दो थल सेना के जवान थे. सातों जवानों की जलकर मौत हो गई. देश की सेवा में जान गंवाने वाले उन सात जवानों में अगर कोई सबसे ज्यादा बदकिस्मत रहा तो फ्लाइट गनर (मास्टर वारंट ऑफिसर) अनिल कुमार सिंह. बदकिस्मत लिखने के लिये माफी भी चाहूंगा. पर उनके साथ बिहार सरकार और सांसद राजीव प्रताप रुढ़ी सहित बड़े नेताओं ने किया ही कुछ ऐसा है. सच कहूं तो बिहार का होने पर कभी शर्मिंदगी महसूस मुझे नहीं हुई. पर अब होती है. छह अक्तूबर 2017 को जान गंवाने वाला बिहार के सारण जिला के मढौरा, मुबारकपुर का लाल अनिल कुमार सिंह को वो सम्मान सरकार नहीं दे पाई, जिसके लिये उनकी शहादत हकदार थी.
अनिल कुमार सिंह ने कड़ी मेहनत और लगन के बूते 1984 में वायुसेना ज्वाइन किया. अपनी सेवाओं के लिये उन्हें कई प्रशस्ति पत्र भी मिले. 1994 में वह फ्लाइंग सेक्शन में चले गये. प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति जैसे वीवीआईपी के दौरे के वक्त वह साथ रहते थे. उन्होंने यूएन पीस कीपिंग मिशन में भी योगदान कांगो में दिया. ये सब खूबियां तो उदाहरण भर की हैं. इसके अलावा उन्होंने अपने हौसले और सूझबूझ से वायुसेना में कार्यरत अपने जूनियर में नई ऊर्जा का संचार भी बखूबी किया. ऐसे होनहार सिपाही के लिये सरकार के पास वक्त नहीं था. सांसद को खबर ही नहीं लग पाई थी. यह हास्यास्पद लगता है. छह अक्तूबर को जान गंवाने वाले शहीद अनिल कुमार सिंह का परिवार और गांव के लोग सात अक्तूबर की शाम तक पार्थिव आने की राह देखते रहे. वायुसेना के अधिकारियों ने अपने फर्ज को बखूबी पूरा किया. उन्होंने अपने स्तर से कोई कमी नहीं छोड़ी. कुछ कारणों से शही का शव आठ अक्तूबर को आ पाया. शहीद के घर से मात्र ढाई सौ मीटर की दूरी पर बिहार के महामहिम के लिये हेलीपैड बनाया गया था. राज्यपाल को अमनौर में सांसद राजीव प्रताप रूढ़ी द्वारा कराये जा रहे धार्मिक आयोजन में हिस्सा लेने जो जाना था. राज्यपाल का हेलिकॉप्टर आठ अक्तूबर की शाम चार बजे आने वाला था. शहीद अनिल का पार्थिव एयर फोर्स के हेलीकॉप्टर से सुबह 11 बजे छपरा के एयरपोर्ट पर उतारा गया. परंतु सारण जिला प्रशासन ने मढौरा में हेलिकॉप्टर उतारने की अनुमति नहीं दी. सब छोड़िये.. पार्थिव आने के बाद या पहले किसी भी जनप्रतिनिधि ने शहीद के घर जाने की जहमत नहीं उठाई. बिहार के सुशासन बाबू (नीतीश कुमार) को शोक जताने तक का समय नहीं मिला. ऐसा ही हाल करीब-करीब सभी मंत्रियों, जनप्रतिनिधियों का रहा. अब खुद ही समझ लेना होगा कि जिस राज्य में शहीद का सम्मान सरकार नहीं कर सकती, उस राज्य का भला क्या होगा. क्या शहीद की यह गलती थी कि वह राजपूत जाति से था. शायद यही गलती थी. वर्ना नीतीश कुमार से लेकर उनके सिपाहसलार हाजिरी लगाते. दुख भरे शब्दों से वोट बैंक की राजनीति करते. ऐसा नहीं कि हर शहीद के लिये सरकार का रवैया ऐसा ही है. कई शहीदों के लिये फौरन आर्थिक मदद की घोषणा होती है. फौरन अपना नुमाइंदा भेजा जाता है. पर शहीद अनिल कुमार सिंह को लेकर सरकार ने जो रुख अपनाया वह शर्मनाक है. आखिर शहीद की परिभाषा बिहार सरकार की किताबों में क्या है. खोजना होगा, ढूंढना होगा. खैर… मुझे ही नहीं, शहीदों पर पूरा देख गर्व करता है. सांसद राजीव प्रताप रूढी तो बिचारे दिल्ली के नेता हैं. उन्हें मढ़ौरा के किसी गांव मुबारकपुर से भला क्या लेना-देना. इन नेताओं को, इस सरकार को उत्तर प्रदेश से सबक लेना चाहिये. योगी जी से सीखना चाहिये कि शहीदों के सम्मान के लिये क्या-क्या किया जा सकता है. पर शायद ऐसा कुछ होगा नहीं. सरकारें आयेंगी, जायेंगी. जनता का इस्तेमाल होता रहेगा.
जय हिंद….

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