कार्य का महत्व

एक गांव में एक व्यक्ति रहा करता था। उसकी अभिलाषा थी कि वह तीर्थाटन पर निकले, परंतु उसके वृद्ध पिता के साथ रहने के का कारण ऐसा संभव नहीं हो पाता था । कोई और उपाय न निकलता देख , वह उनको साथ लेकर ही तीर्थ यात्रा पर निकला। पिता के स्वास्थ्य के कारण मार्ग में कई बार रुकना पड़ता तो उसके मुख पर आए खीज के भाव यद्यपि बाहर नही निकलते थे, तब भी दिखाई तो पड़ ही जाते थे । एक दिन उसने राह में एक छोटी-सी बच्ची को देखा, जो अपनी गोद में एक छोटे से बालक को लिए जा रही थी । उत्सुक्तावश उसने बालिका से पूछा ——“बेटा! तुम इस बालक को इतनी देर से गोद में लिए हो , तुम्हे वजन नहीं अनुभव होता ?”
बच्ची ने उत्तर दिया—–” में तो अपने भाई को गोद में लिए हुए हूँ, उसे उठाने में भला कैसा भार लगेगा ! पर ऐसा लगता , जैसे आप किसी अपरिचित को साथ ले आये है; क्योकि आपके चेहरे पर जरूर थोडा भार आ गया है ।” व्यक्ति को महसूस हुआ की प्रेम से किया गया कार्य कभी बोझ नहीं बनता, पर अनमने भाव से किया गया कार्य बोझ जरूर बन जाता है।

Share this post

Leave a Reply

scroll to top