भूल का भान

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गंगा तट पर एक ऋषि अपनी पत्नी के साथ निवास करते थे। बड़ी आयु हो जाने पर ऋषि दंपति को एक पुत्र की प्राप्ति हुई। ऋषि व ऋषिपत्नी, दोनों अपने पुत्र से अत्यंत प्रेम करते थे। पिताजी की ही भांति पुत्र में भी तप व ज्ञान के लक्षण दिखाई पड़ते थे। बाल्यकाल से ही बालक को गहन चिंतन करने की आदत थी। उसके मन में अनेक प्रश्न उठते, परंतु वह किसी से पूछता नहीं था और स्वयं ही चिंतन करता रहता था। एक दिन ऋषि के लिए पानी लाने में उनकी पत्नी को कुछ विलम्ब हो गया। ऋषि इसे अपना अपमान जानकर क्रोधित हो गए और उन्होंने पुत्र को माँ का सिर काटने की आज्ञा दी और स्वयं जंगल चले गए।
बालक विचार करने लगा कि क्या जन्म देने वाली ममतामयी माँ को मारना उचित है? और यदि माँ को नहीं मारता हूँ तो पितृ आज्ञा की अवहेलना होगी। मुझे क्या करना करना चाहिए?–बालक इस विचार में डूब गया। कुछ समय पश्चात् क्रोध शांत होने पर ऋषि को अपनी भूल का भान हुआ और वे अपने आश्रम की ओर दौड़े। वहां पहुच कर और अपनी पत्नी को जीवित देख कर उनका मन शांत हुआ। बालक ने कहा–“पिताजी! आपकी आज्ञा की अवहेलना के लिए मुझे क्षमा कीजिये, परंतु माँ को नहीं मारा जा सकता।” ऋषि बोले–“पुत्र! तुम ठीक कहते हो। मैं क्रोध के आवेश में पाप करने की आज्ञा दे बैठा था। तुम्हे चिंतन की आदत के कारण आज मैं हत्यापराध से बच गया।” इसीलिए कहा जाता है कि कोई भी कार्य सोच-विचार कर ही करना चाहिए।

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